i fc jdkeje
संदेश
फ़रवरी, 2021 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं
आयो बसंत नयो री
- लिंक पाएं
- X
- ईमेल
- दूसरे ऐप
बारिश के रुदन से ,हंसते हुए बसंत तक, मैं तुम्हें तलाशती हूं, आकाश के अंत तक। ज्यूं भाव छिपे हृदय में ,मुझ में बैठा ब्रह्म त्यूं, अभी हैं असंख्य योजन पहुंचने में अरिहंत तक। मिलन के आगे कोई संभावना नहीं बचती, और बिछुड़न का विस्तार है दूर अनंत तक। तुझे सोचने भर से ही मिलता है आनंद मुझे, सदियों की गहन प्यास से लेकर तुष्टी तुरंत तक। आनंद को सीमाबद्ध कौन कर सकेगा भला, बच्चे की प्रथम हंसी से, मस्त मलंग संत तक। नारी करती आई है पूर्ण, नर आकांक्षाओं को मनुहार भरे प्रेमी से लेकर , हठीले कंत तक। 🙏🏾 दिनेश✍