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 💐 विप्र की कलम से💐           ‎💐💐💐💐💐💐💐        श्री कृष्णम शरणम गच्छामि  ढाई आखर प्रेम का पड़े बने सुजान,,        मन मंदिर में जो धरई प्रभु का ध्यान। जाके अन्तर्मन में होइ प्रेम निष्काम,        ता पर बरसई कृपा कृष्ण बलराम। मन की शुद्धता बुद्धि की स्थिरता,        प्रेम,पूजा साधना कामना की सफलता। प्रेम प्रीत की रीत होइ पुरानी,       जा जन धरई प्रेम प्रीत कर की बानी। सोई नर नारी बनई सुज्ञानी,       ‎ प्रेम भक्ति में सोई जन होए बखानी। जो जन प्रेम कर बंधन को जानी,        ता पर होइ प्रभु कृपा परम् ज्ञानी। प्रेम एक बंधन अनुबंध होइहैं,       संत पंथ मुनि जन सब यही कहै। प्रेम अन्तर्मन का भावना होइ हैं,  ‎ प्रेम तो मन से मन सम्बन्ध कहि है।  ‎ जो प्रेम न समझे प्रीतम क्या जाने  ‎ मीरा थी प्रेम दीवानी प्रभु जी माने।  ‎जो प्रेम रस भावना न पहचानी,  ‎ कभी भी नही हो सकता द...